अपने किये की सफ़ाई न दो

अपने किये की सफ़ाई न दो
जब हो भुगतना, दुहाई न दो।।

दुनियाँ में कोई नहीं है फरिश्ता
ख़ुद को यूँ ख़ुद ही रिहाई न दो।।

कहती है बीवी कि हाथों में माँ के
मेहनत की अपनी कमाई न दो।।

थी आख़िरी सीख रावण ने समझी
ख़ेमे में दुश्मन के भाई न दो।।

ऐबों को अपने छुपा के “बशर” तुम
औरों के हिस्से बुराई न दो।।

दिनेश चंद्र पाठक “बशर”

2 Comments

  • Posted February 10, 2021 12:43 pm
    by
    डॉ कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

    सुन्दर ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई।

    • Posted February 10, 2021 1:25 pm
      by
      Dinesh Chandra Pathak

      बहुत बहुत धन्यवाद महोदया

Add Your Comment

Open chat
Whatsapp Me