अलग दुनियाँ

अलग दुनियाँ

बसा लेते हैं अलग दुनियाँ, बेटे जवान होने पर
क्या करें वो बूढे माँ-बाप, बेसहारा हो जाने पर ।
पाला था बड़े नाजों से, बुढापे का होगा सहारा
वो तो छुड़ा गया दामन, ब्याहता हो जाने पर ।
खयाल आया उसे इक दिन, पहुंचा भी था घर
दरवाजा बन्द मिला, न ताला था लगा बाहर ।
भीतर गया विश्मित हुआ, बैठ गया शीश थाम
आखों में अश्रु की धारा, देखा जो घर का मंजर ।
हे प्रभु! यह क्या हुआ, मैं क्यों नादान बन गया
माई-बाबा मिले तो सही, मगर कंकाल होने पर ।
__ हीराबल्लभ पाठक ‘निर्मल’

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