क्या नहीं है पहाड़ में?


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धरा क्या है पहाड़ में ?
ऐसा कहने लगे हैं लोग
भुला ! क्या नहीं है पहाड़ में
सुन्दर हरियाली ठंडा पानी
हिसाऊ काफल सेव की दाणी
बांज बुरांस आड़ू खुबानी
बेड़ू तिमिले और नारंगी 
थोड़ा सा बनना पड़ता है पहाड़ी ।
नदियाँ झरने देवों की वाणी
बद्री केदार गंगोत्री जमनोत्री
चार धाम नृसिंह की धूंणी
जागनाथ बागनाथ पाण्डुखोली दूनागिरि
दर्शनीय कौसानी और माँ पूर्णागिरि
हिमालय कैलाश मानसरोवर
देखने आती दुनियाँ सारी।
भाबर में जो पीते हो पानी
कहाँ से आया क्या यह जानी
एक नदी उगाकर देखो तो मैदान में
तब कहें तुम हो ज्ञानी ।
भुला ! यह पहाड़ ही है
जो करता है सबकी पालना
यही पहाड़ है जहाँ उगती हैं नदियाँ
दर्द एक-दूसरे का  बांटते लोग
मिलजुल कर रहते हँसते गाते लोग
झोड़े चांचरी और लगाते जागर
कंथ कहानी  मालूशाही
और गाते हैं दर्द भरी न्योली।
जब पितृदोष लगने वाला ठैरा
पूछ-जाछ करके
जागर लगाने पहाड़ ही आना ठैरा
काला मुर्गा और जगरिया भी
पहाड़ में ही मिलनेवाला ठैरा बल ?
भुला ! परदेस में क्यों मारते हो डाड़
आओ पहाड़ आओ पहाड़
मेरे भुला ! आओ पहाड़
आओ पहाड़ 🙏🏼
(हीराबल्लभ पाठक “निर्मल”
स्वर साधना संगीत विद्यालय
लखनपुर रामनगर , नैनीताल)

1 Comment

  • Posted January 20, 2021 7:51 am
    by
    दिनेश चंद्र पाठक

    सुंदर

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