भोर की बतियां

भोर की बतियां
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जब भयी भोर उजियारा छाया
कलियाँ खिली और मन मुस्काया
पंछी चले दाना चुगने
पनघट पर पनिहारन का झुंड आया।
आपस में यूं करती बतियां
क्यों री ! तूने नहीं बताया
तेरा पिया घर आया है, बोल क्या क्या लाया।
माथे की बिन्दी और गले का हार लाया?
चल हट! मोहे लाज आवे
क्यों बतलाऊं क्या-क्या लाया
तूने भी तो अपनी बेरी हमको नहीं बताया।
अरी सखी! मैं बतलाऊं
देख जरा इसकी अंखियां
अलसायी हैं जैसे, जागी हो सारी रतिया।
अरी ओ! पिया रंगीले की दीवानी
चली जा इठलाती घर को
‘निर्मल’ अचल सुहाग हो तेरा
करना जी भर-भर कर बतियां ।
करना जी भर-भर कर बतियां ।
_ हीराबल्लभ पाठक ‘निर्मल’

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