मन का भीषण समर न देखा

मन का भीषण समर ना देखा
भाग्य का मेरे भँवर ना देखा
अपना कहलाने वालों ने
हृदय का सूना घर ना देखा।।

बाल्यकाल का हठ ना जाना
ना यौवन का स्वप्न ही जाना
मेरे सीमित साधन से जो
कुछ था बाहर, उधर ना देखा।।

जीवन ने जितना अपनाया
मैंने उतना हाथ बढ़ाया
खुलकर जो ना गले लगाये
कभी भी मैंने उधर ना देखा।।

अश्रुडोर से छाले सीता
स्वयं की आशाओं को पीता
विरुदावली गाने वालों ने
कंटकपथ का क़हर ना देखा।।

छुपा हास्य में रुदन ना देखा
भावों का क्रंदन ना देखा
शिखरों के अनुरागी थे सब
हीनता का गह्वर ना देखा।।

जब मैं मुक्त हुआ जीवन से
आशाओं के हर बन्धन से
तुमने उस से पहले मेरे
मन में होता ग़दर ना देखा।।

जीवन संघर्षों की गाथा
आज स्वयं पर है इठलाता
तुमने विपदाओं के क्षण में
इसका भीगा स्वर ना देखा।।

उदित हो रहा सूर्य ही देखा
बजता जय का तूर्य ही देखा
तुमने षड्यंत्रों में लिपटा
कालरात्रि का प्रहर ना देखा।।

विजय पे विस्मित होने वालों
मेरी जय से कुढ़ने वालों
श्रम में मेरा तिल-तिल जलता
तुमने तृषित अधर ना देखा।।

दिनेश चंद्र पाठक
संगीत अध्यापक

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