सरयू से सागर तक भाग 340

यथास्थितिवादी समाज में जिजीविषा का अभाव होता है।जिजीविषा का अभाव सामाजिक गतिहीनता के रूप में यथास्थितिवादी होता है।इस तरह यथास्थितिवादी होना सामाजिक जड़त्व का होना होता है।वैसे भी समाज जटिलताओं एवम सहजता का समुच्चय है।प्राकृतिक घटकों की तारतम्यता में सहजता ज्यादे है अपेक्षाकृत जटिलताओं के।जटिलताएं उलझती हुई गुत्थी है तो सहजता उलझती हुई गुत्थी को सुलझा लेना है।मानवीयता का इतिवृत्तात्मक इतिहास जटिलताओं से सहजता को प्राप्त करने का रहा है।मानव सभ्यता का विकास जटिलताओं से लड़ने व जटिलताओं को सहज बनाने का है।तभी तो उत्तरोतर सहजता को प्राप्त संतति सहजता में जटिलताओं को देखती रही और जटिल होती जा रही है।मनुष्य प्रकृति द्वारा प्राप्त सहजता से जटिलता की तरफ उन्मुख होते हुए, पुनः सहजता को प्राप्त हो जाता है।सहजता या जटिलता प्रकृतिक घटकों के समुच्चय हैं,जिसकी अनवरत यात्रा में जिज्ञाषा ही वह आंतरिक घटना है जो स्वयम में अन्वेषण की तरफ उन्मुख होती हुई दिखती है।जिजीविषा नकारात्मकता से सकरात्मक की यात्रा है एवम जिज्ञाषा ने ही हममें-आपमें जीवनादर्श को जन्म दिया है।

जिजीविषा से उतपन्न जीवनादर्श स्वयम में जटिलताओं व सहजताओं का घर्षण है।जिजीविषा के घर्षण को जानने की प्रक्रिया में हम सब सहजता से जटिलताओं को जानते है या जटिलताओं से सहजता को प्राप्त होते है।निर्भर करता है हमारी आपकी संवेदनात्मक प्रकृति की प्रवृत्ति पर कि हम-आप उलझ कर सुलझ जाते है या सुलझकर उलझ जाते हैं।इस तरह प्राकृतिक धटकों से उतपन्न मनुष्य की दृष्टि उलझती हुई सुलझती है या सुलझता हुआ मनुष्य उलझ जाता है।जीवन की विविधा में इतने रूप रंग है कि हम-आप प्रकृति के आकर्षणों-विकर्षण से मुक्त नही हो पाते।प्राकृतिक आकर्षणों में या तो हम आकर्षणों के आग्रह की परिधि में खड़े होकर वही देखते हैं, जो हम देखना चाहते हैं,या इसके पृथक जो हम देख लेते हैं, वह जटिल लगने लगता है।इन वैचारिकि आदर्शो के उच्चावच में हमारे खुद के आकर्षण-विकर्षण होते हैं। उन्ही आकर्षणों एवम विकर्षण में हम प्राकृतिक घटकों के समुच्चय में अपने मत की स्थापना करते हैं।इस स्थापना के क्रम में हम उन्ही सामाजिक समुच्चय से अनुप्राणित होते हुए अपने मत की स्थापना करते हैं।

धर्म,दर्शन,साहित्य,राजनीति,अर्थशात्र,इतिहास,मानव विज्ञान,मनोविज्ञान से गुजरता मानव इन विषयों के वैविध्य से मुक्त नही हो पाता तथापि गतिशील संसार में जीवन वैविध्य में गतिशील रहता है।जीवन के आरम्भ से अंत तक की अनवरत यात्रा के क्रम में जो लख लिया जा रहा है वह लिख दिया जाता है।वस्तुतः जीवन पुरुषवाचक वाचक है क्योंकि जिसमें पौरुषेय होगा वही तो उपकृत्य करेगा।इस तरह जीवन से स्वयम के स्वयम से उपकृत्य होने का बोध होता है तत्सन्दर्भो में मानवीय जीवनधारा ही मानवजाति को उपकृत्य करती रही है।जीवन जहां उपकृत्य की भूमिका में है जो मानवता मानवीयता का आंतरिक परिष्कार करती हुई दिखती है।इस तरह मानवीय होना पौरूषेय के प्रतीक है।आदर्श को प्राप्त होना ही प्रथम पुरुष है।प्रथम पुरुष संज्ञात्मक रूप जितना सहज दिखता है उतने सहज रूप से हम उनको अभिव्यक्त नही कर पाते।इसीलिए तुलसी के राम,कवीर के राम व मेरे राम,सबके राम हैं।राम,तुलसी,कवीर से पहले के है।इसी तरह हमारे-आपके राम जन्मजन्मांतर के राम हैं।राम अत्यंत सहज व क्लिष्ट हैं।इसीलिए उनको व्यक्त करना अत्यंत क्लिष्ट है।क्लिष्ठता उनका स्वभाव है।मानस की सहजता व क्लिष्ठता को जब आप लख रहे होते हैं तो वे अत्यंत सहज प्रतीत होते हैं।पर अनिर्वचनीय को निर्वचनीय बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य है।तभी तो संसार को जटिलताओं व सहजताओं का समुच्चय कहा गया है।
मानव शब्द की उत्तपत्ति जितनी सम है,भाव जितने सम है,उसकी रंजकता जितनी सम है,उतनी सम उनकी व्याख्या नही है।अतः मानवता से मानव को लख लेने के बाद मानव का मानवतावादी होने की यात्रा लिखना नई भाषा व भाव की खोज करना है।इसलिए कि मानव समुदाय जितने ही सहज अनुभूति में लख लिए जाते हैं उसे लिखना उतना ही क्लिष्ठ होता है।सहज उतना क्लिष्ठ नही होता।जितना क्लिष्ठ का सहज होना है।आईये देखते हैं भाषाई रूप से मानवता क्लिष्ठ क्यों हैं?

भाषा की क्लिष्टता प्राकृतिक है।जब भाव घने हो तो उसको अभिव्यक्त करने के लिए वे ही शब्द मिलेंगे जिससे उस शब्द के भाव प्रकट हों।मनोजगत में ऐसे कोई भाव नही जिसके लिए शब्द न हों और कोई ऐसा शब्द नही जिससे भाव की उत्तपत्ति न हो।इस तरह से भाव को अभिव्यक्त करता हुआ चाह की उत्तपत्ति नैसर्गिक रूप इस जगत में व्याप्त है।चाह-भाव का तीव्रतम वेग होता है।ये तो अच्छा है भाव को प्रकट करने के लिए हमारे पास शब्द हैं एवम भाषा है।कल्पना कीजिये भाषा के अभाव में क्या भाव स्पस्ट न होंगे?स्मरण रखना चाहिए कि भाव के उद्रेक के पहले हृदय में भाव आलोड़न करता है और भाव की भाषिक अभिव्यक्ति भाषा के रूप में बाद में होती है।इसके प्रमुख कारणों में मनुष्य के अंतर्मन के भाव व उसके चाह की सांयोगिक क्रिया-प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही हम-आप स्वयम में अभिव्यक्त होते हैं।भाषाई क्लिष्टता,भाव की क्लिष्टता है।अलग-अलग चित्तवृत्तियाँ में रचे-बसे हम मनुष्यों में भाव व चाह ही सृजन के वे पक्ष है जो आपस मे अन्तःक्रिया करते हुए वैचारिक स्पस्टता को प्राप्त होते है।

वैचारिकि स्पस्टता में मनोजगत के स्पस्ट चित्र होते हैं।इस तरह हम सबके नित्प्रायः वैचारिक अरुणिमा के स्फोट में हम जिस जगत को देखते हैं,वह हमारी संवेदनात्मक प्रकृति की प्रतिकृति होती हैं।संवेदनात्मक प्रतिकृतियाँ विचारों के परावर्तन की वह प्रक्रिया है जिसमें विचारों का संश्लेषण होता चलता है।वैचारिकि संश्लेषण प्रकाश का संश्लेषण है। प्रकाश स्वम् में आकाश द्वारा अनुदृत है।इस तरह हम सबका मन आकाश के अरुणाभ की प्रतिकृति होता है।अरुणाभ प्रकाश का समुच्चय है,जिससे किरणों के रैखिक या छैतिज दिशा में परावर्तन की प्रक्रिया होती है और हम पृथ्वी के जिस कोण पर खड़े होते है उसी कोण पर आभा का अन्तरस्पर्ष करते हैं।इस अन्तरस्पर्ष का संस्पर्षण एवम संस्पर्षण का अन्तरस्पर्ष हममें अन्तरस्पर्शी दृष्टि देता है और दृष्टि के उजास में हम-आप उसी तरह के भाव को व्यक्त करते है जो जिस भाव को प्रकट होते हैं।यही नहीं हम-आप ठीक वहीं से विचारों को शब्दिक रूप से अवशोषित करते हुए अरुणाभ के भाव को स्पस्ट करते हैं।

भाव का विचारों के रूप में संश्लेषण आपकी चाह पर निर्भर करता है।जो आपकी जिज्ञाषा की अन्तरज्वाला होती है।मनोचित्त में चाह का केंद्रीभूत स्वरूप ही भाव को सम्प्रेषित करता है।इस तरह से भाव की सघनता चाह में संश्लेषित होती हुई विचारों का सृजन करती है।सृजन वैचारिकि परावर्तन की प्रक्रिया है।अतः सृजन आपको करना नही होता वह आपके मष्तिष्क में सींझता जाता है।सींझना आवेग-संवेग की वह प्रक्रिया है जो मष्तिष्क में सींझने के क्रम में और भी सांद्रता के साथ अभिव्यक्त होता है।भाव व भावाभिव्यक्ति की चाह हमें सृजन के उस विन्दू पर एकाग्रचित्त करते हैं जहां से विचार अपने परावर्तन प्रक्रिया के बाद सींझते हुए हमें प्राप्त होते हैं।जैसे खाद्य योग्य बस्तु को बनाने के लिए पहले अन्न को सींझना पड़ता है।अन्न जितना ही सींझता जाता है वह वाह्य ऊष्मा के प्रभाव एवम अपने आंतरिक गुण को परिवर्तित करता चलता है। तभी जाकर वह खाने योग्य होता है जिससे शरीर को उर्जा मिलती है।उसी तरह मष्तिष्क में विचारों को सीझना होता है,अच्छी तरह से सीझ जाने वाले विचार ही भाव को शब्द और शब्दों से भाषा के व्यवहृत रूप को प्राप्त होते हैं।

शेष कल

ईश्वर हम सबका कल्याण करें।

श्री रवि शंकर पांडेय

अधिवक्ता, लखनऊ उच्च न्यायालय।

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