हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार प्राचीन भारत में संगीत की स्थिति

हिन्दू जनजीवन में संगीत मुख्यतः दो प्रकार से सम्मिलित रहा है। पहला प्रकार विशुद्ध रूप से भक्तिसंगीत का है जिसके अंतर्गत अपने उपास्य की भक्ति तथा उसके गुणों का गान करना गायक अथवा भक्त का एकमात्र उद्देश्य होता है, तथा दूसरा रूप लोकरंजन से सम्बंधित है जिसके अंतर्गत शृंगारपरक अथवा सामाजिक विषयों से सम्बंधित रचनाओं का गायन प्रमुख है।
भारतीय संगीत यहाँ के पवित्र मंदिरों के प्राँगण में ही पला-बढ़ा तथा विकसित हुआ है। सैंकड़ों-हज़ारों वर्षों से हिन्दू भक्तगण संगीत के माध्यम से अपने आराध्य को रिझाते रहे हैं, चाहे वह देवर्षि नारद अथवा गंधर्वराज तुम्बुरू जैसे पौराणिक पात्र रहे हों अथवा मध्यकाल में जन्मे संगीत सम्राट तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास जी अथवा आधुनिक संगीत के उद्धारक के रूप में सुविख्यात श्री विष्णु दिगम्बर पलुष्कर जैसे भक्त गायक, सभी ने संगीत को अपनी साधना का माध्यम बनाया। हिन्दू धर्मग्रंथों में सांगीतिक उपासना का विशेष महत्त्व माना गया है। कहा भी गया है –
पूजकोटिगुणंस्तोत्रं स्तोत्रान्कोटिगुणो जपा।
जपात्कोटिगुणं गानं गानात्परतरं नहि।।
अर्थात् – पूजा से करोड़ गुना अधिक फलदायक स्त्रोत का पाठ है, स्तोत्र से करोड़ गुना फलदायक जप है, जप से करोड़ गुना फलदायक गान है तथा गान से परे कुछ भी नहीं है।
इस प्रकार उक्त पंक्तियाँ भारतीय आध्यात्मिक जगत में संगीत की महत्ता को स्पष्ट करती हैं। यही कारण है कि प्रायः सभी यज्ञादि कार्यों में सामगायन का विशेष महत्त्व था, तथा जो गायक यज्ञों में सामगायन करते थे वे विशेष आदर के पात्र होते थे। महाराज दशरथ के द्वारा पुत्र प्राप्ति की इच्छा से किये गए पुत्रेष्टि यज्ञ में किये गए सामगायन का वर्णन इस प्रकार है –
गतिभिर्मधुरै स्निग्धैर्मन्त्राह्वानैर्यथार्हतः
होतारो ददुरावाह्य हविर्भागान् दिवौकसाम्।।
(मधुर एवं मनोहर सामगान के लय में गाये हुए आह्वान करके होताओं ने उन्हें (देवताओं को) उनके योग्य हविष्य के भाग समर्पित किये।)
प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनि यह मानते थे कि संगीतयुक्त स्तुति से देवताओं को शीघ्र प्रसन्न किया जा सकता है तथा ईश्वर की उपासना हेतु संगीत की जिस गायन पद्यति का प्रयोग किया जाता था उसे मार्गी संगीत कहा जाता था। मार्गी संगीत का परिचय देते हुए शारंगदेव कहते हैं –
मार्गी देशीति तद् द्वेधा तत्र मार्गः स उच्यते
यो मार्गितो विरंचियाद्यै प्रयुक्तो भरतादिभिः।।
अर्थात् – संगीत दो प्रकार का है – मार्गी और देशी। जिस संगीत का अन्वेषण ब्रह्मादिकों ने तथा प्रयोग भरतादिकों ने किया, उसे मार्गी संगीत कहते हैं।
मार्गी संगीत में प्रयुक्त छंद संस्कृत भाषा में होते थे तथा गायन संबंधी नियम अत्यंत कठिन एवं अपरिवर्तनीय थे। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में श्रीरामचंद्र के दोनों पुत्रों लव तथा कुश द्वारा मार्गी संगीत पद्यति से रामायण का गान करने का प्रसंग इस प्रकार उद्धृत किया गया है –
ततस्तु तौ रामवचःप्रचोदितावगायतां मार्गविधानसंपदा
स चापि रामः परिषद्गतः शानिर्बुभूषयासक्तमनाभूव।।
अर्थात् – तदनंतर श्रीराम की आज्ञा से प्रेरित हो वे दोनों भाई मार्गविधान रीति रामायण का गान करने लगे। सभा में बैठे हुए भगवान श्रीराम भी धीरे-धीरे उनका गान सुनने में तन्मय हो गए।
मार्गी संगीत का स्वरूप क्या था तथा इसे किस प्रकार गाया-बजाया जाता था, इस बारे में हम आज बहुत कुछ नहीं जानते, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि तत्कालीन समय में यह सभी यज्ञादि क्रियाओं का अनिवार्य अंग हुआ करता था। शायद अत्यंत क्लिष्ट गायन पद्यति तथा नियमों में लोच का अभाव होने के कारण मार्गी संगीत कालांतर में धीरे-धीरे लुप्त होता चला गया।
धार्मिक क्रियाओं के अतिरिक्त सामाजिक जीवन में भी संगीत का महत्त्व कुछ कम नहीं था। संगीत के उत्तम विद्वानों को समाज में विशेष आदर दिया जाता था। श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के अंतर्गत राजा संजय की पुत्री दमयंती देवर्षि नारद से विवाह की इच्छा प्रकट करती है, किन्तु अपनी माता से सहज आज्ञा प्राप्त न होने पर वह नारद के सांगीतिक गुणों को उनके समक्ष रखकर संगीत की महत्ता बताते हुए कहती है –
“हे माता! वन में रहने वाली वे हरिणियाँ धन्य हैं जो नाद से मोहित होकर प्राण भी दे देती हैं, किन्तु इस भूलोक में रहने वाले उन मूर्ख मनुष्यों को धिक्कार है जो मधुर स्वर से प्रेम नहीं करते। राजा संजय की पुत्री दमयंती ने अपनी माता से कहा – “हे माता! स्वर का ज्ञाता, ग्रामों का पूरा ज्ञान रखने वाला, मूर्च्छना के भेदों को सम्यक प्रकार से समझने वाला तथा आठों रसों को जानने वाला दुर्बल पुरूष भी इस संसार में दुर्लभ है। जिस प्रकार गंगा, सरस्वती नदियाँ कैलाश ले जाती हैं, उसी प्रकार स्वरज्ञान में प्रवीण पुरूष शिवलोक पहुँचा देता है। जो व्यक्ति स्वर के प्रमाण को जानता है, वह मनुष्य होता हुआ भी देवता है, किन्तु जो स्वरों के सप्तभेद का ज्ञान नहीं रखता, वह पशु के समान होता है, चाहे वह इंद्र ही क्यों न हो।”
इस प्रकार हम देखते हैं कि संगीतानुरागहीन व्यक्ति को पशुओं से भी हीन माना गया है, जो कि भारतीय जन-जीवन में संगीत की महत्ता को रेखांकित करता है।
संगीत की यह महत्ता मात्र सामान्य जीवन तक सीमित नहीं अपितु जब इक्ष्वांकुवंशी महाराज दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामचंद्र को युवराज पद देने हेतु अपने बुद्धिमान से परामर्श करते हैं तो जिन गुणों के आधार पर मंत्रीगण श्रीरामचंद्र के नाम का समर्थन करते हैं उनमें संगीतकला का मर्मज्ञ होना भी श्रीराम का एक महत्त्वपूर्ण गुण कहा गया है। यथा-
गांधर्वे च भुवि श्रेष्ठो बभूव भरताग्रजः।।
अर्थात् – भरत के बड़े भाई (श्रीराम) गांधर्ववेद में भी इस भूतल पर सबसे श्रेष्ठ हैं।
जिस नगर या घर में वीणा तथा मृदंग जैसे मांगलिक वाद्यों का वादन होता था उसे पवित्र तथा सुरुचिसम्पन्न समझा जाता था। प्रायः वीणा, मृदंग, पणव, दुंदुभी तथा डमरू जैसे वाद्यों का वर्णन हिन्दू धर्मग्रंथों में प्रचुरता से प्राप्त होता है। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में अयोध्या नगरी की शोभा तथा वैभव का वर्णन करते हुए कहा गया है कि भूमण्डल की वह सर्वोत्तम नगरी दुंदुभी, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्यों की मधुर ध्वनि से गूँजती रहती थी।
दुंदुभिर्मृदंगैश्च वीणाभिः पणवैस्तथा
नादितां भृशमत्यर्थं पृथिव्यां तामनुत्तमाम् ।।
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में ही अयोध्या के बारे में कहा गया है कि उस पुरी में ऐसी बहुत सी नाटक मण्डलियाँ थीं जिनमें केवल स्त्रियाँ ही नृत्य एवं अभिनय करती थीं। यथा –
वधूनाटक संघैश्च संयुक्तां सर्वत्रः पुरीम्।।
इससे प्रतीत होता है कि तत्कालीन समय में नाटक विधा भी अपने उत्कृष्ट स्वरूप में थी तथा उनमें स्त्री अभिनेत्रियों तथा नर्तकियों का स्वतंत्र अस्तित्व था, वे पुरुष कलाकारों के आधीन नहीं थीं।
मात्र महलों में रहने वाले राजपुरुष अथवा सामान्य नागरिक ही नहीं, अपितु वनों में जीवन व्यतीत करने वाले ऋषि-मुनि भी संगीत संबंधी आयोजनों में विशेष रुचि लेते थे। श्रीराम के छोटे भाई भरत के भरद्वाज ऋषि के आश्रम आने पर भरद्वाज ऋषि द्वारा स्वर्ग के गंधर्वों तथा अप्सराओं को बुलाकर संगीत सभा का आयोजन करने का उल्लेख है। यथा –
आह्वये देवगन्धर्वान् विश्वावसुहहाहुहून
तथैवाप्सरसो देवगंधर्वैश्चापि सर्वशः।।
अर्थात् – मैं (भरद्वाज मुनि) विश्वावसु, हाहा और हूहू गंधर्वों का तथा उनके साथ समस्त अप्सराओं का भी (महाराज भरत का स्वागत करने हेतु) आवाहन करता हूँ।
इसी प्रकार –
शक्रम् याश्चोपतिष्ठन्ति ब्रह्माणं याश्च भामिनिः सर्वस्तुम्बुरुणा सार्धमाह्वये।।
अर्थात् – जो अप्सराएँ इंद्र की सभा में उपस्थित होती हैं तथा जो देवांगनाएँ ब्रह्माजी की सेवा में जाया करती हैं, उन सबका मैं (भरद्वाज मुनि) तुम्बुरू के साथ आह्वान करता हूँ। वे (महाराज भरत का स्वागत करने हेतु) अलंकारों तथा नृत्यगीत के लिये अपेक्षित अन्यान्य उपकरणों के साथ यहाँ आएँ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार प्राचीन भारत में संगीतकला को अत्यंत प्रतिष्ठा प्राप्त थी। किन्तु यह प्रतिष्ठा एक प्रकार का विरोधाभास भी अपने साथ लिये हुए थी। क्योंकि जहाँ एक ओर हम सभी धर्मग्रंथों में संगीत के प्रति विशेष श्रद्धा का भाव पाते हैं, वहीं दूसरी ओर संगीतकला द्वारा जीविकोपार्जन करने वाले व्यक्ति को तुच्छ माना गया है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायणव्रती व्यक्ति को जिन लोगों के सानिध्य से दूर रहने को कहा है उनमें संगीत द्वारा जीविकोपार्जन करने वाले व्यक्तियों की भी सम्मिलित किया गया है। यथा-
कुंडाशिनं गायकं च तथा देवलकाशनम्
भिषजं काव्यकर्तारं देवद्विजविरोधिनम्
परान्नलोलुपमं चैव परस्त्रीनिरतं तथा
रामायणव्रतपरो अवाग्मात्रेणापि नाचर्येत्।।
(जो व्यक्ति कुण्ड (स्त्री द्वारा परपुरुष से उत्पन्न पुत्र) के यहाँ भोजन करता है, जो गीत गाकर जीविका चलाता है, देवता पर चढ़ी वस्तु का उपभोग करने वाले मनुष्य का अन्न खाता है, वैद्य है, लोगों की मिथ्या प्रशंसा में कविता लिखता है, देवताओं तथा ब्राह्मणों का विरोध करता है, पराये अन्न का लोभी है और परस्त्री में आसक्त रहता है, ऐसे मनुष्य का रामायणव्रती पुरुष वाणीमात्र से भी आदर न करे।
जहाँ एक ओर धर्मग्रंथों में संगीत की महत्ता को मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया गया है, वहीं दूसरी ओर संगीत द्वारा जीविकोपार्जन करने वाले लोगों के प्रति ऐसा भाव आश्चर्यचकित तो करता ही है, किन्तु शायद संगीत के प्रति विशेष श्रद्धा तथा पवित्रता का भाव ही इसका प्रमुख कारण भी है। क्योंकि भारतीय संस्कृति में परमार्थ सम्बन्धी ज्ञान अथवा पवित्र वस्तुओं से किसी प्रकार का अर्थलाभ अनुचित माना गया है। जो भी हो उक्त उदाहरणों से इतना तो सिद्ध होता ही है कि प्राचीन भारत में संगीत जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से गहराई से जुड़ा था तथा संगीत का वह स्वरूप आरम्भिक न होकर अपनी चरम विकसित अवस्था में था।।
मेरी पुस्तक “हिन्दू धर्मग्रंथों में संगीत” का एक अंश।।

3 Comments

  • Posted April 2, 2021 1:03 pm
    by
    अजय कुमार

    अभिनन्दन

  • Posted April 2, 2021 4:02 pm
    by
    Rajeev Ranjan

    बहुत ही ज्ञानवर्धक आलेख। आपको साधुवाद।

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