हिन्दू धर्मग्रंथों में संगीत

अध्याय एक- हिन्दू धर्म एवं उसके प्रमुख धर्मग्रंथ।।

हिन्दू धर्मग्रंथों में संगीत
अध्याय एक – हिन्दू धर्म एवं उसके प्रमुख ग्रंथ
हिन्दू धर्मग्रंथों में संगीत से पूर्व हिन्दू धर्म,इसकी प्रमुख मान्यताओं तथा इसके प्रमुख ग्रंथों पर चर्चा करना मेरे विचार से अधिक उपयुक्त रहेगा। अतः इस अध्याय में हिन्दू धर्म तथा उसके प्रमुख ग्रंथों का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।
हिन्दू धर्म एक परिचय
धर्म शब्द की उत्पत्ति “धृ” धातु से मानी गई है, जिसका विस्तार विद्वानों द्वारा इस प्रकार किया जाता है – “धार्यते इति धर्म:”, अर्थात जो धारण करने योग्य हो या धारण करे वही धर्म है। धर्म शब्द पर और अधिक गहराई से विचार करने पर इसके दो प्रकार समझ में आते हैं। पहला प्रकार वह है जो किसी भी वस्तु अथवा जीव को प्रकृति अथवा ईश्वर ने सहज रूप में प्रदान किया है। यह किसी भी वस्तु या प्राणी का सहज गुण होता है। जैसे अग्नि का धर्म है दग्ध करना अथवा जलाना, जल का धर्म है शीतलता, विभिन्न पशु-पक्षियों का धर्म कर्मफल के भोग तक सीमित माना गया है तथा मानव जीवन का प्रमुख धर्म कर्म करना माना गया है। धर्म का दूसरा प्रकार मानव निर्मित है। यह अनेक वर्षों के अनंतर मानव के विभिन्न धार्मिक विश्वासों के फलस्वरूप अपना स्वरूप ग्रहण करता है। मात्र धार्मिक विश्वास ही नहीं अपितु मानव जीवन से संबंधित कई नियम भी कई बार धार्मिक स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। उदाहरण के लिये किसी भी देश अथवा समाज में विवाह एक सामाजिक कर्म है, किन्तु प्रायः सभी जाति-धर्मों में इसके लिये कुछ धार्मिक नियम भी निर्धारित हैं।
प्रत्येक देश व जाति का अपना एक धर्म होता है। जो उस देश के धार्मिक विश्वास तथा सामाजिक नियमों पर आधारित होता है। यूँ तो भारतीय संविधान में भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया गया है, फिर भी जिस धर्म या संस्कृति का सर्वाधिक प्रभाव इस देश के जनमानस पर रहा है वह हिन्दू धर्म ही है। विभिन्न धर्मों की भाँति हिन्दू धर्म की भी अपनी कुछ मान्यताएँ तथा धार्मिक विश्वास हैं जो इसे एक सुदृढ आधार प्रदान करते हैं। सगुण तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना, वेदों के प्रति अटूट श्रद्धा, धर्म सम्बन्धी नियमों तथा मान्यताओं में लचीलापन, किसी भी धर्म/सम्प्रदाय की अच्छी बातों को स्वयं में आत्मसात कर लेना हिन्दू धर्म की कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो इसे अन्य धर्मों की अपेक्षा एक विशिष्टता तो प्रदान करती ही हैं, इसके अतिरिक्त समय-समय पर हिन्दू संस्कृति पर किये गए सुनियोजित आक्रमणों के बाद भी इन विशेषताओं के कारण हिन्दू धर्म ने अपनी विशिष्ट पहचान को सुरक्षित तो रखा ही, साथ ही अन्य धर्मों से जुड़े विद्वानों तथा बुद्धिजीवियों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। प्रत्येक धर्म की अपनी कुछ मान्यताएँ होती हैं। इनमें से कुछ तो अन्य धर्मों से मिलती-जुलती तथा कुछ अन्य धर्मों से अलग होती हैं। उदाहरण के लिये प्रायः सभी धर्म सत्य बोलने, परोपकार करने तथा ईश्वर में दृढ़ विश्वास की शिक्षा देते हैं। साथ ही जहाँ कुछ धर्म सगुण ईश्वर की उपासना पर बल देते हैं वहीं कुछ धर्म ईश्वर के निराकार रूप को मान्यता देते हैं। जहाँ तक बात हिन्दू धर्म की है, आज जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं वह कुछ विद्वानों के अनुसार एक जीवनशैली है जिसके अंतर्गत समस्त भारत में पाए जाने वाले भिन्न-भिन्न प्रकार के आचार-विचार, सांस्कृतिक परिवेश, कला, भाषाएँ आदि सभी कुछ सम्मिलित हो जाता है।
हरबंस सिंह तथा लालमणि जोशी के अनुसार – वास्तव में हिन्दू शब्द भूगोलशास्त्र का शब्द है। इसका अर्थ है “भारतीय”। अतः अंग्रेजी भाषा में प्रसिद्ध “हिन्दूइज़्म” से वही अर्थ प्रकट होना चाहिए जो “इंडियनिज़्म” शब्द से प्रकट होता है। इस व्याख्या के अनुसार “हिन्दू” भारत की सभी चीजों का बोधक होगा, जैसे भारतीय कला, भारतीय भाषाएँ, भारतीय लिपियाँ, भारत का साहित्य, भारत के धर्म, भारत के आचार-व्यवहार, भारत के दर्शनशास्त्र और भारत की सामाजिक संस्थाएँ। यह शब्द संक्षेप में भारतीय सभ्यता का सूचक होगा।”
उक्त शब्द हिंदुत्व को भारतीयता के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसमें भारतवर्ष में प्रचलित समस्त अन्य धर्म भी आ जाते हैं। जबकि कुछ अन्य विद्वान हिन्दू धर्म को उस सनातन धर्म का ध्वजावाहक बताते हैं जो विश्व का सर्वाधिक प्राचीन धर्म रहा है। यहाँ पर हिन्दू धर्म से हमारा आशय इस से सम्बंधित दूसरे विचार को ही आधार मानकर लिया गया है। इस विचार के अनुसार हिन्दू धर्म की कुछ प्रमुख मान्यताएँ इस प्रकार हैं-

  • इस सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण एवं संचालन किसी अज्ञात एवं परम् शक्तिशाली शक्ति द्वारा किया जाता है जिसे ब्रह्म की संज्ञा दी गई है।
  • ब्रह्म स्वयं में निराकार है किन्तु अपनी इच्छानुसार अपने भक्तों के हितसाधन के लिये वह सगुण रूप भी धारण करता है। अतः ईश्वर के सगुण तथा निर्गुण दोनों रूपों की उपासना का प्रचार हिन्दू धर्म में पाया जाता है।
  • प्रत्येक जीव उसी परमपिता का अंश है जो माया के प्रभाव से स्वयं को ईश्वर से अलग समझ लेता है, माया के प्रभाव से मुक्त होकर परमसत्ता से एकाकार होना मानव जीवन का परम लक्ष्य माना गया है, जिसे मोक्ष कहते हैं। मोक्ष प्राप्त करने हेतु मानव को कर्मफल की इच्छा से मुक्त होना अनिवार्य है।
  • प्रत्येक मनुष्य को कर्मफल के अनुसार स्वर्ग अथवा नर्क की प्राप्ति होती है। अच्छे कर्म करने वाले मनुष्य को स्वर्ग तथा बुरे कर्म करने वाले मनुष्यों को नर्क की प्राप्ति होती है।
  • वेदों को हिन्दू धर्म का परम प्रामाणिक ग्रंथ माना गया है। वेद अपौरुषेय हैं, अर्थात इनका निर्माण किसी मनुष्य द्वारा नहीं किया गया, अपितु स्वयं परमपिता परमात्मा के निःश्वासरूप में इनका जन्म हुआ है।
  • वेदों के अतिरिक्त ब्राह्मण, आरण्यक, पुराण तथा उपनिषद भी हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं और मूलतः देखा जाए तो ये वेदों का ही अंग हैं।
    उक्त सभी धार्मिक विश्वासों के अतिरिक्त सामाजिक जीवन से जुड़ी कई मान्यताएँ भी हिन्दू धर्म का आधार हैं, जिनमें सदैव परोपकार में संलग्न रहना, अतिथि को देवता मानकर आदर-सत्कार करना, राष्ट्रहित में सर्वस्व न्यौछावर करने की भावना प्रमुख हैं। हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ग्राह्यता है। किसी भी धर्म अथवा संस्कृति की अच्छी बातों को सहर्ष अपना लेने की भावना यहाँ कूट-कूटकर भरी है। यही कारण है कि कितनी ही सभ्यताएँ समय-समय पर विश्वपटल पर उभरी और इतिहास के पन्नों में विलुप्त हो गईं, किन्तु आज भी हिन्दू धर्म सम्पूर्ण विश्व के धर्मों एवं संस्कृतियों हेतु एक सुखद आश्चर्य की भाँति अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित है। मशहूर शायर “इकबाल” की ये पंक्तियाँ हिन्दू धर्म पर अपने वास्तविक रूप में चरितार्थ होती हैं-
    कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
    सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा।।
  • शेष आगे………

“हिन्दू धर्मग्रंथों में संगीत” पुस्तक से।।
दिनेश चंद्र पाठक।।

2 Comments

  • Posted December 22, 2020 2:34 pm
    by
    Ravi Shankar Pandey

    सारगर्भित ।।

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