क्या नहीं है पहाड़ में?

///////■\\\\\\\धरा क्या है पहाड़ में ?ऐसा कहने लगे हैं लोगभुला ! क्या नहीं है पहाड़ मेंसुन्दर हरियाली ठंडा पानीहिसाऊ काफल सेव की दाणीबांज बुरांस आड़ू खुबानीबेड़ू तिमिले और नारंगी थोड़ा सा बनना पड़ता है पहाड़ी ।नदियाँ झरने देवों…

लाख की चूड़ियाँ

“लाख की चूड़ियां” कक्षा-8विषय-हिन्दी(कहानी का कविता रूपान्तरण) वो बैठता बूढ़े नीम तले,हवा चलती हौले -हौले.गुड़-गुड़ हूक्का उसकाबोले,लकड़ी की चौखटडग-मग डोले.बगल में भट्टीदहकाया करता,रोज लाखपिघलाया करता.सभी उसे काका,कहके बुलाते,रंग-बिरंगीचूड़ी बनवाते,गांव-गांव और,शहर-शहर में,चूड़ियाँ बिकती,हर अवसर में.सूहाग की चूड़ीखूब सुहाती,नव-वधु…

दोस्त बनके ही रहो

है तकाज़ा इश्क़ का अब दोस्त बनके ही रहोकह रही है दिलरुबा अब दोस्त बनके ही रहो।। जो कि मेरे नाम से मशहूर थी होने लगीवो कहीं कर आई वादा, दोस्त बनके ही रहो।। दिल कहे कि…

लब पे तेरा नाम आया

लब पे तेरा नाम आया, यूँ ख़ुदा के साथ मेंबंदगी औ इश्क़ दोनों, हो गए इक साँस में।। तोड़ दुनियाँ की रवायत, छोड़ इसकी उलझनेंमाँगने कुछ हूँ मैं आया, आज तेरे पास में।। इश्क़ का अब है…

भाव मेरे कब समझोगी

भाव मेरे कब समझोगी, कब मन के भीतर उतरोगी? सुनो प्रिये शब्दों से परे कब नयन की भाषा बरतोगी? नयन से तन-मन बेधोगी, कब अधर से आमंत्रण दोगी कहो कि कब इस हिरदय की आतुर याचना को…

राष्ट्रगौरव राम

भाव हो कर्तव्य का, तुम प्रेम का संचार हो राम जननायक, नरोत्तम, अखिल जगदाधार हो।। दीनजन के सहज सम्बल, आर्तजन की पुकार हो तृप्ति हो उपकार की, करुणा के तुम भण्डार हो।। सीमा मर्यादा की हो, गुण-रूप…

महादेव स्तुति

शूलपाणि हे महादेव हे विश्वनाथ उद्धार करो राम-कृष्ण की पुण्यभूमि में अतुल शौर्य संचार करो।। विश्वरूप हे महाकाल भयनाश करो, भवत्राष हरो मुख तेजोमय, धीर हृदय हों, मन में स्वच्छ विचार भरो।। रामचंद्र सी राजनीति हो, कूटनीति…

ग़ज़ल – तमाम मुश्किलें, मजबूरियाँ, हालात रहने दे

तमाम मुश्किलें, मजबूरियाँ, हालात रहने दे प्यार कर बैठा हूँ तुझसे, तो प्यार रहने दे।। जज़्बा ए इश्क़ नहीं उम्र का मोहताज़ कभी तू अपनी उम्र का होश ओ हिसाब रहने दे।। इश्क़ महबूब से जो है…

निर्मोही

निर्मोही ! तू चला कहाँमुझे छोड़  इस निर्जन वन में ।खड़े भेड़िये अनगिनतजीभ लपलपाते मानव तन में ।मनुष्यता यहाँ नहीं हैदानवता का तम फैलासूरज भी असहाय साविचर रहा है नीलगगन में ।वनचर भी हैं उदासदेख भेड़ियों की…

कहाँ है भगवान्

हम स्वयं को जानते नहींबातें  बुजुर्गों की मानते नहींकहाँ है भगवान ? हम कहते हैंअपने आस-पास देखते नहीं ?वो देखो खिलती कलियों कोकल-कल करती नदियों कोझर-झर बहते झरने कोगरजते मचलते सागर कोक्या इनमें भी नजर आता नहीं…

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