राष्ट्रगौरव राम

भाव हो कर्तव्य का, तुम प्रेम का संचार हो राम जननायक, नरोत्तम, अखिल जगदाधार हो।। दीनजन के सहज सम्बल, आर्तजन की पुकार हो तृप्ति हो उपकार की, करुणा के तुम भण्डार हो।। सीमा मर्यादा की हो, गुण-रूप…

निर्दयी

             भोर की पहली किरन कासंदेशा कुक्कुट ही लायाफिर क्यों रे तुच्छ मानव !तूने उसे निवाला बनाया ।जल को स्वच्छ मीन करतीउसे भी विचरने न दियाजाल और काँटे से उसकाभी तो वध तूने किया ।हिरन का स्वच्छन्द चरना…

हिन्दू धर्म एवं संगीत का अंतःसंबंध

प्रायः सभी हिन्दू धर्मग्रंथों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में संगीतकला का अति महत्वपूर्ण स्थान रहा है। हिन्दू धर्मग्रंथों में जहाँ कहीं भी किसी हर्षपूर्ण घटना, अथवा मंगलकार्य संबंधी प्रसंग का वर्णन…

आहट

सुनाई देती है आहट तुम्हारीजैसे अभी तुम आ ही रही होसपना है या ये भ्रम का अंधेरासूरत नज़र आ रही ना तुम्हारी ।बेचैन मन ये पागल हुआ क्योंआखिर ये सपना आया ही क्यों थाअसर है शायद यही…

वृक्ष धरा के आभूषण

वृक्ष धरा के आभूषण॥🌿॥॥🌻॥॥🌿॥मैं भी एक परिंदा होता,               स्वछंद विचरता नीले नभ मेंइस प्रकृति के शुभ शृंगार का,                            अवलोकन करता।पर एसा कैसे हो सकता है,                         तुच्छ एक मैं मानव हूँक्रूरता का दाग ऐसा,                       मानव हूँ या दानव…

दूरियाँ

__/\__/\__नई – पुरानी पीढ़ी कीपिता और पुत्र कीसास और बहू कीघर के ही आँगन मेंबढ़ रही हैं दूरियाँ ।वसन्त पिछले जैसा नहींबरसात भी पहले जैसी नहींभाई से भाई के बीचमानव से मानव के बीचक्यों बढ़ रही दूरियाँ…

लक्ष्मी

विपिनभाई सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। सेवानिवृत्ति के बाद गाँव में अपने पुश्तैनी घर में आ गये, उनके दो बेटे थे एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टर और दूसरा शहर के इन्टर कालेज में लेक्चरर लग गया था।…

महादेव स्तुति

शूलपाणि हे महादेव हे विश्वनाथ उद्धार करो राम-कृष्ण की पुण्यभूमि में अतुल शौर्य संचार करो।। विश्वरूप हे महाकाल भयनाश करो, भवत्राष हरो मुख तेजोमय, धीर हृदय हों, मन में स्वच्छ विचार भरो।। रामचंद्र सी राजनीति हो, कूटनीति…

ग़ज़ल – तमाम मुश्किलें, मजबूरियाँ, हालात रहने दे

तमाम मुश्किलें, मजबूरियाँ, हालात रहने दे प्यार कर बैठा हूँ तुझसे, तो प्यार रहने दे।। जज़्बा ए इश्क़ नहीं उम्र का मोहताज़ कभी तू अपनी उम्र का होश ओ हिसाब रहने दे।। इश्क़ महबूब से जो है…

निर्मोही

निर्मोही ! तू चला कहाँमुझे छोड़  इस निर्जन वन में ।खड़े भेड़िये अनगिनतजीभ लपलपाते मानव तन में ।मनुष्यता यहाँ नहीं हैदानवता का तम फैलासूरज भी असहाय साविचर रहा है नीलगगन में ।वनचर भी हैं उदासदेख भेड़ियों की…

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