बेटी

बेटी

हर घर का श्रृंगार है बेटी
श्रृष्टि का उपहार है बेटी
आशा का संचार है बेटी
युगों-युगों का धर्म है बेटी
तेरी बेटी मेरी बेटी
अमृत रस की धार है बेटी
घर आँगन की रंगोली और
प्रकृति का आधार है बेटी
बेटी बिन घर सूना-सूना
खुशियों का संसार है बेटी
जीवन पथ पर हार न माने
संकट में तलवार है बेटी
अबला मत समझो बेटी को
झाँसी की रानी है बेटी
दुर्गा चंडी काली बन कर
भी करती उद्धार है बेटी
खुशनसीब के घर है बेटी
ईश्वर का उपकार है बेटी
मन से “निर्मल” कली सी कोमल
जीवन की बहार है बेटी

हीराबल्लभ पाठक “निर्मल”

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