समर्पण

समर्पण
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जोगिया रे ! चला कहाँ ?
पीछे मुडकर देख जरा, यह स्वर्णिम संसार।
नहीं-नहीं यह धोखा है
इसके पीछे मत हो पागल, यह खोटा बाजार।
अरे ओ पगले! देख जरा
परियों सी है सूरत मेरी, भटक रहा क्यूँ जार-जार।
तेरी सूरत ढल जायेगी
तू भी इकदिन पछतायेगी, रूप नहीं यह सदाबहार ।
प्रेम का फल कितना मीठा
तू क्या जाने ओ पगले ! , चख तो ले इकबार ।
जिसे प्रेम तुम कहती हो
वही तो पागलपन है, भटक रहा सारा संसार ।
तू क्या जाने प्रेम का जादू
करता है तू जिसकी बातें, उसका नहीं कोई आधार।
प्रेम की बातें तुझे मुबारक
मेरा परमेश्वर से प्यार , वही है सबका पालनहार।
“निर्मल”उसकी ही छवि से, है समर्पित मेरा प्यार ।
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__हीराबल्लभ पाठक ‘निर्मल’

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